वर्ष 2026 में इंदिरा एकादशी का व्रत 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार के दिन रखा जाएगा।
महत्वपूर्ण तिथियां और समय:
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 6 अक्टूबर 2026 को सुबह 02:07 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 7 अक्टूबर 2026 को सुबह 12:34 बजे
- व्रत पारण का समय (व्रत खोलने का समय): 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को सुबह 06:16 बजे से सुबह 08:39 बजे के बीच
खास बातें:
- इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान आती है, इसलिए इसे ‘पितृ पक्ष एकादशी’ भी कहा जाता है।
- इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पितरों को मोक्ष और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
इंदिरा एकादशी की सुबह की पूजा की तैयारी दशमी तिथि से ही शुरू हो जाती है और सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके संकल्प लिया जाता है।
सुबह की पूजा की तैयारी
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ब्रह्म मुहूर्त में उठना और स्नान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे पीले या स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- व्रत का संकल्प: भगवान विष्णु का ध्यान करें और मन में व्रत रखने तथा पितरों की शांति की कामना का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की सफाई: घर के मंदिर या पूजा स्थान को साफ करें। चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं।
- भगवान की स्थापना: चौकी पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और विशेष रूप से शालिग्राम जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
पूजा सामग्री की तैयारी
- पुष्प व माला: पीले फूल, तुलसी दल। (ध्यान रखें कि तुलसी दल एकादशी से एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।
- भोग व प्रसाद: पीला फल, पीली मिठाई, पंचामृत।
- पूजा के बर्तन व सामग्री: घी का दीपक, धूप, कुमकुम, अक्षत (चावल), पीला चंदन।
- पितरों के लिए सामग्री (इंदिरा एकादशी पर विशेष): जल, तिल, और अन्न या भोजन का अंश (ब्राह्मण, गाय, कौवे और कुत्ते के लिए
पूजा की विधि
- दीप प्रज्वलन: भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं।
- अर्पण: भगवान को पीले वस्त्र, पीला चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता।
- भोग लगाना: तैयार किया हुआ फलाहार या सात्विक भोग और तुलसी पत्र भगवान को चढ़ाएं।
- पाठ एवं मंत्र जाप: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें। चाहें तो विष्णु सहस्रनाम या इंदिरा एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें।
- आरती: अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें।
- पितृ स्मरण व तर्पण: इस एकादशी पर पितरों का ध्यान करके जल, तिल अर्पित करें और उनके निमित्त दान-पुण्य करें।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में माहिष्मती नगरी में राजा इंद्रसेन राज्य करते थे. वे धर्मपरायण और भगवान विष्णु के भक्त थे. उनके शासन में प्रजा भी सुखी थी. एक दिन देवर्षि नारद राजा इंद्रसेन के दरबार में पहुंचे. राजा ने उनका स्वागत किया और उनके आने का कारण पूछा.
तब नारद जी ने बताया कि वे यमलोक गए थे, जहां उन्होंने राजा इंद्रसेन के पिता को देखा. राजा के पिता को एक व्रत के नियम का ठीक से पालन न करने के कारण यमलोक में कष्ट भोगना पड़ रहा था. नारद जी ने राजा से कहा कि उनके पिता ने संदेश भेजा है कि यदि वे इंदिरा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य उन्हें समर्पित करें, तो उन्हें यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिल सकती है.
यह सुनकर राजा इंद्रसेन ने नारद जी से इंदिरा एकादशी व्रत की विधि बताने का अनुरोध किया. तब नारद जी ने बताया कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए. दशमी तिथि को सात्विक भोजन करना चाहिए और रात में भूमि पर सोना चाहिए. इसके बाद एकादशी के दिन स्नान आदि कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए.
एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए और रात्रि में जागरण करना चाहिए. साथ ही, पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए.
राजा इंद्रसेन ने नारद जी के बताए अनुसार पूरी श्रद्धा से इंदिरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को समर्पित कर दिया. कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उनके पिता को यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिली और मोक्ष की प्राप्ती हुई.
पारण का शुभ समय
- प्रातः काल: 6:16 बजे से सुबह 8:39 बजे तक (विभिन्न पंचांगों के अनुसार सुबह 6:17 बजे से 8:38 बजे के बीच भी उत्तम मुहूर्त है)।
- द्वादशी तिथि का समापन 7 अक्टूबर को सुबह 11:16 बजे (या रात के पंचांग अनुसार दोपहर से पहले) होगा।



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